Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 60
41 verse-groups
- Verse 1उनसठवाँ सर्म समाप्त साठवाँ सर्ग लीलोपाख्यान के प्रयोजन का विस्तार से वर्णन ओर काल आदि की…
- Verse 2यदि किसी को यह शंका हो कि जगत् में सत्यता के त्यागमात्र से उसकी निवृत्ति कैसे होगी ? दृश…
- Verse 3ज्ञानी पुरुष आकाशरूप ज्ञान से ज्ञेयस्वरूप दृश्य को पूर्वोक्त रीति से अपवाद द्वारा अखण्ड ब…
- Verse 4दृश्य तो जड़ है, उसकी ज्ञानघन ब्रह्म में एकरसता कैसे ? ऐसी आशंका कर आदि सृष्टि में चिन्मा…
- Verse 5यदि कोई कहे कि जैसे ओलों की कठिनता प्रयत्न के बिना ही शान्त हो जाती है, वैसे ही प्रयत्न क…
- Verse 6यदि कोई शंका करे कि इस जगत् की रचना ब्रह्माजी ने की है, जीव की क्या ताकत कि इसे रोक दे,…
- Verse 7ऐसी परिस्थिति में सत्ता, नियति, वासना आदि से भी जगत् की रक्षा नहीं हो सकती , इस आशय से क…
- Verse 8यह सब यद्यपि मायादृष्टि से जैसा दिखाई देता है, वैसे ही ज्यों-का-त्यों स्थित है, तथापि परम…
- Verse 9श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, आपने मुझे, जैसे वनाग्नि से जले हुए तृणों की दाह की शान्त…
- Verse 10हर्ष की बात है कि आज चिरकाल में अखण्ड ज्ञातव्य पदार्थ जिस प्रकार जाना जाता है, जैसा उसका…
- Verse 11हे द्विजश्रेष्ठ, जगत्ततत्वका विचार कर रहा मैं उपाधि के शान्त होने से शान्त-सा हो रहा हूँ…
- Verse 12भगवन्, कृपा करके आप मेरे इस सन्देह को निवृत्त कीजिये, क्योकि आप सर्वज्ञ हैं। आपके वचनरूप…
- Verses 13–15वह पूर्वोक्त काल, जो लीला के पति के तीन जन्मों में बीता, वह कहीं तो (गिरिग्राम में तो) आठ…
- Verses 16–17यदि जैसी पदार्थों की सत्ता है, उसीके अनुसार प्रतीति हो, तो यह विरोध हो सकता है, अनिर्वचनी…
- Verse 18इन पदार्थों के स्वरूप की जैसी भावना की, वही (भावित स्वरूप ही) चिरकाल के अभ्यास से नियति क…
- Verses 19–21चिति का स्फुरण स्वभाव है, जैसे और जिस रूप में उसका स्फुरण होता है, वह शीघ्र उसी रूप में ह…
- Verses 22–23लोक में भी यह प्रकार प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं। दुःखी (वियोगी) पुरूष को जो रात्रि कल्प-सी…
- Verses 24–32राजा हरिश्चन्द्र को एक रात्रि बारह वर्ष की प्रतीत हुई थी, लवणासुर ने एक रात्रि में सौ वर्…
- Verse 33भावना से आकाश पीला, नीला या सफेद प्रतीत होता है, मोहवश उत्सव भी आपत्ति के सदृश दुःखदायी ह…
- Verses 34–35देखिये न, स्वप्न में देखी गई रत्री भावनावश जागरण काल की तरह आनन्ददायिका होती है, जो पदार्…
- Verse 36सम्पूर्ण मन की समष्टि ओर व्यष्टि का कार्य होने से भी जगत् असत्य ही है, ऐसा कहते हैं । जि…
- Verses 37–38यह जगत् वस्तुतः मूर्तिमान् नहीं हे, अतः किसी दूसरे का अवशेष नहीं करता, जो इसका अवरोध कर…
- Verse 39जैसे स्वप्न में मेरे समीप में महायोद्धाओं से छेडा गया पुरुष जागने पर भी सुषुप्त के सदश अज…
- Verse 40जैसे शिशिर ऋतु के अन्त में (वृक्ष आदि के पत्र गिरने के समय) आगे वसन्त में पत्र, पुष्प आदि…
- Verses 41–43जैसे सोने के अन्दर द्रवत्व विद्यमान है, पर लोगों को दृष्टिगोचर नहीं होता, अग्नि का संयोग…
- Verse 44महाकल्प ओर सृष्टि के आदि में यह जगत् चित्स्वभाव ही है, असत् पदार्थ ही पीछे कारण में ली…
- Verse 45सम्पूर्ण जगत् के आकार में परिणत पूर्व-पूर्व हिरण्यगर्भ में अहंबुद्धि की कल्पनारूप उपासना…
- Verse 46जैसे अन्यान्य ब्रह्माण्डों में रहनेवाले प्राणियों के अलग-अलग वासना, कर्म आदि हैं, वैसे ही…
- Verse 47सृष्टिकर्ता के संकल्प से विहित अन्य जीवों की प्रतीति प्रधान जीव की प्रतीति की अनुवर्तनी ह…
- Verse 48उसके अनुरूप फल देनेवाला भोक्ता के अद्वृष्ट का संयोग भी उसमें हेतु है, ऐसा कहते हैं । सबका…
- Verse 49इस प्रकार के उच्च कुल से उत्पन्न हुआ यह हमारा स्वामी है, राजा विदूरथ के नगर के पदार्थ और…
- Verse 50यदि कोई शंका करे कि चित् तो उदासीन है। उसके अध्यस्त पदार्थ प्रतीतिरूप स्फुरणे क्या हेतु…
- Verses 51–52पहले तदनुकूल संकल्पवैचित्र्य की उत्पत्ति भी पूर्वोक्त रीति से ही होती है, ऐसा कहते हैं ।…
- Verse 53ऐसी अवस्था में बिम्ब के रहते प्रतिबिम्ब हटाया नहीं जा सकता, फिर निर्विकल्पतारूप मोक्ष की…
- Verse 54बलवान् चिद्-विलासों की परस्पर अनुवृत्ति से स्वभाव चित्तरूपी आदर्श में अपने आप प्रतिबिम्…
- Verse 55यदि कोई शंका करे कि यदि ऐसी बात है, तो जगत् के प्रति आकर्षण चिरकाल से अभ्यस्त है, उसीमें…
- Verse 56यदि कोई कहे कि भले ही ब्रह्माकार संवित् की, अतिवेगवत्ता होने से, विजय हो, लेकिन जब मन्द…
- Verses 57–59इस प्रकार प्रसंगप्राप्त मोक्ष के अभाव की आशंका का निवारण कर जो विषय छिडा था उसीका यानी प्…
- Verse 60विवेकद्ृष्टि से प्रपंच की पृथक् सत्ता का अभाव कह कर मायिक दष्ट से भी उसकी पथक् सत्ता नह…
- Verse 61जीवों की दृष्टि से भी बोध होने तक ही वह भिन्नरूपवाला प्रतीत होता है, बोध होने पर विस्मृति…
- Verses 62–63माया से भेद के अवभासित होने पर भी शुद्ध की वास्तविक एकरूपता से स्थिति का कोड विरोध नहीं ह…