Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
मातृमेयप्रमाणादिमायात्मकमजं पदम् ।
बुद्धं विस्मृतिमायाति न कदाचन कस्यचित् ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
जीवों की दृष्टि से भी बोध होने तक ही वह भिन्नरूपवाला प्रतीत होता है, बोध होने पर
विस्मृति के कारणभूत अज्ञान के हट जाने से वह एकरूप ही रहता है, ऐसा कहते हैं ।
बोध होने तक ही प्रमाता, प्रमेय, प्रमाण आदि मायिक रूपवाला अविनाशी अज पर
(परब्रह्म) जब जान लिया जाता है, तब विस्मृति के हेतु अज्ञान के हट जाने से फिर कभी
किसीको भी विस्मृत नहीं होता, एक अद्वितीयरूप से प्रतीत होता है