Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

दुःखितस्य निशा कल्पः सुखितस्यैव च क्षणः । क्षणः स्वप्ने भवेत्कल्पः कल्पश्च भवति क्षणः ॥ २२ ॥ यथा च मृत्वा जातोऽहं तरुणो यौवनस्थितः । यातोऽस्मि योजनशतं स्वप्न इत्यनुभूयते ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

लोक में भी यह प्रकार प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं। दुःखी (वियोगी) पुरूष को जो रात्रि कल्प-सी लम्बी प्रतीत होती है, वही रात्रि सुखी पुरुष को क्षण के तुल्य हो जाती है। स्वप्न में एक क्षण कल्प बन जाता है और कल्प क्षण बन जाता है । जरा ध्यान दीजिये एक क्षण के स्वप्न में पुरुष देखता है-मैं मर कर पैदा हुआ, जवान हुआ, यौवनावस्था में स्थित हुआ, मैं सौ कोश गया, ऐसा स्वप्न में सबको अनुभव होता है