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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verses 62–63

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, verses 62–63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 62

संस्कृत श्लोक

शून्योदयास्तमयवस्तु तमःप्रकाशं दिक्कालरूप्यपि सदैकमनादिशुद्धम् । आद्यन्तमध्यरहितं स्थितमच्छमम्बु सौम्यत्ववीचिवलनाढ्यमिवैकमेव ॥ ६२ ॥ अहंत्वमित्यादिजगत्स्वरूपा विशुद्धबोधैकविभा विभाति । आकाशकोशे निजशून्यतेव द्वैतैक्यसंकल्पविकल्पनाच्च ॥ ६३ ॥

हिन्दी अर्थ

माया से भेद के अवभासित होने पर भी शुद्ध की वास्तविक एकरूपता से स्थिति का कोड विरोध नहीं है, इस आशय से उपसंहार करते हैं। जैसे निर्मल जल चाहे तरंगित हो चाहे निश्चल, दोनों अवस्थाओं में जल के स्वरूप में कोई भेद न आने से एकरूप ही है, वैसे ही साक्षीरूप से अज्ञान को प्रकाशित करनेवाला, दिशा और कालरूपी होता हुआ भी परमार्थरूप से सदा शुद्ध, जिसमें सम्पूर्ण विकारों के उदय और नाश नहीं रह गये हैं ऐसा आत्मरूप पदार्थ आदि, अन्त और मध्य से रहित होकर एकरूप से स्थित है