Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verses 37–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 37,38
संस्कृत श्लोक
मायामात्रकमेवेदमरोधकमभित्तिमत् ।
इदं भास्वरमाभातं स्वप्नसंदर्शनं स्थितम् ॥ ३७ ॥
अपूर्वमेवासुप्तस्य नरस्येवोदितं विदुः ।
अचेता चेतति स्तम्भो यादृशं शालभञ्जिकाम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत् वस्तुतः मूर्तिमान् नहीं हे, अतः किसी दूसरे का अवशेष
नहीं करता, जो इसका अवरोध करे, ऐसी दूसरी वस्तु भी इसमें नहीं है और मायामात्र ही
है, ऐसा होने पर भी स्पष्टरूप से प्रतीत हो रहा है, इसलिए तत्त्वज्ञानी लोग इसे न सोये
हुए पुरुष को हुआ अपूर्व स्वप्नदर्शन मानते हैं । जैसे अपने स्फुरण के अनुकूल व्यापार से
रहित स्तम्भ अपने स्वरूप में प्रतिमारूप को प्रकट करता है, वैसे ही परमार्थ महास्तम्भ
(स्वाधिष्ठान चैतन्य) भी वैसा होकर, वैसी ही सृष्टि को सृष्टिकाल में देखता है ॥