Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verses 34–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, verses 34–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 34, 35
संस्कृत श्लोक
वेदनात्स्वप्नवनिता जाग्रतीव रतिप्रदा ।
यद्यथाभासमायातं तत्तथा स्थिरतां गतम् ॥ ३४ ॥
असदेव नभश्चैव नभ एव चिदात्मनि ।
शतहस्ताम्बुदच्छायानटनृत्तमिवाततम् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
देखिये न, स्वप्न में देखी गई रत्री भावनावश जागरण काल की तरह आनन्ददायिका
होती है, जो पदार्थ जिस रूप में आभासित हुआ, वह उसी रुप में स्थिर होता गया । जगत्
असत् ही है।
शका - यदि जगत् असत् ही है, तो उसे सरासर मिथ्या ही कहना चाहिए।
समाधान - सरासर झूठा भी नहीं है, किन्तु अव्याकृत आकाशरूप है, क्योंकि कार्य
कारण से अतिरिक्त नहीं है । वह अव्याकृत आकाश ही अपने अधिष्ठानभूत चिदात्मा में सौ
हाथ के मिथ्या नटके, जो मेघ की छाया से कल्पित है, नाच के (एक प्रकार के अभिनय के)
सदृश जगत् की विलक्षणता के रूप से विस्तार को प्राप्त हुआ है