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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verses 57–59

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, verses 57–59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 57-59

संस्कृत श्लोक

जायमानेषु नश्यत्सु वर्तमानेषु भूरिशः । एवं सर्गसहस्रेषु परमाणुकणं प्रति ॥ ५७ ॥ न किंचित्केनचिद्ध्याप्तं न किंचित्केनचित्स्थितम् । चिदाकाशमिदं शान्तमतः सर्वमभित्तिमत् ॥ ५८ ॥ अयमाभासते स्वप्नो निर्निद्रो दृष्टिवर्जितः । अवश्यंभाविबोधस्तु स्वनुभूतोऽप्यसन्मयः ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार प्रसंगप्राप्त मोक्ष के अभाव की आशंका का निवारण कर जो विषय छिडा था उसीका यानी प्रत्येक जीव में सम, विषम सकल विचित्रताओं का ही अवलम्बन कर कहते हैं। उपाधिवश प्राप्त हुई परिच्छिन्नता का अपने में आरोप करने से परमाणुकणरूप जीवसमूह के प्रति पूर्वोक्त प्रकार की सम, विषम हजारों सृष्टियों के भ्रान्तिवश उत्पन्न होने पर, स्थित होने पर और विनष्ट होने पर वास्तव में किसी जीवरूपी कण को न तो दौड़ धूप करने से कुछ वस्तु प्राप्त हुई और न उदासीन होकर बैठे रहने से ही कुछ वस्तु अप्राप्त हुई । भाव यह कि जो वस्तु है ही नहीं, वह न तो प्राप्ति के योग्य है और न अप्राप्ति के योग्य । अतः (जब कुछ वस्तु है ही नहीं तब) यह सब व्यवधानरहित (निरावरण) शान्त चिदाकाश ही है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है ।यह स्वप्न प्रतीत होता है, ऐसा स्वप्न कि जिसमें विवेकदृष्टि का अभाव है और निद्रा भी नहीं है, इसके अधिष्ठानरूप आत्मा का साक्षात्कार होने पर तो पहले भली भाँति अनुभूत होता हुआ भी यह असन्मय ही हो जाता है