Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चितः समनुवर्तन्ते मुख्यायाः सर्वसंविदः ।
यथा विपुलवात्यायाः सामान्या वातलेखिकाः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
सृष्टिकर्ता के संकल्प से विहित अन्य जीवों की प्रतीति प्रधान जीव की प्रतीति की अनुवर्तनी
हो, इत्याकारक जो नियति है, वही सबको विदृरथकुलक्रम के एक-सा प्रतीत होने में हेतु है,
ऐसा कहते हैं।
जैसे छोटे-मोटे वायु के झोंके बड़े बवंडर का अनुसरण करते हैं, वैसे ही सब प्रतीतियाँ
मुख्य चित् का ही अनुवर्तन करती हैं