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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । पौराणां मन्त्रिमुख्यानां विदूरथकुलक्रमः । सममेव कथं तत्र सर्वेषां प्रतिभासितः ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे अन्यान्य ब्रह्माण्डों में रहनेवाले प्राणियों के अलग-अलग वासना, कर्म आदि हैं, वैसे ही एक नगर में रहनेवालों में प्रत्येक प्राणी के भी वासना कर्म आदि विचित्र हैं, इसलिए स्वप्न के तुल्य जाग्रत में भी क्रम की विलक्षणताका आरोप क्यो नहीं होता ? यानी सभीको भिन्न- भिन्न क्रम से प्रतीति क्यो नहीं होती, इस आशय से श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं । भगवन्‌, नगरवासी, मन्त्री आदि सभी को विदूरथ के कुल का क्रम एक-सा ही क्यों प्रतीत हुआ ? इसमें क्या कारण है ?।