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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

कुड्येऽपि ख इवाचारो दृष्टो नन्वविचारिणः । असद्यक्षो विमूढानां प्राणानप्यपकर्षति ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

भावना से आकाश पीला, नीला या सफेद प्रतीत होता है, मोहवश उत्सव भी आपत्ति के सदृश दुःखदायी होता है छोटे-छोटे बालक अपने खेल कूद के उत्सवों में कभी-कभी रोते दिखाई देते हैं ॥ ३ २॥ अविचारी पुरुष का जहाँ पर दीवार खड़ी है, वहाँ पर भी शून्य का (दीवाररहित का) सा व्यवहार देखा गया है, अविद्यमान भी यक्ष मूढ लोगों के प्राणों को हर लेता हे । भाव यह कि जो पदार्थ असत्य है, उनमें कार्य करने की क्षमता लोक में प्रसिद्ध है, वेताल वस्तुतः है नहीं, पर वह मूढ लोगों के प्राणहरणरूप कार्य को कर ही लेता है