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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 106

एक सौ पाँचवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छठा सर्ग उक्त घोड़े द्वारा वन में पहुँचाये गये राजा का चाण्डाल कन्या के साथ विवाह वर्णन |

26 verse-groups

  1. Verses 1–2राजा ने कहा : हे सभासदों, इस पृथिवीमण्डलका सगा भाई सा यह देश, जो विविध वन और नदियों से यु…
  2. Verse 3जैसे पाताल से मायावी मय दानव अपने-आप निकल आवे वैसे ही यह कोई ऐन्द्रजालिक दूर से आ पहुँचा,…
  3. Verse 4जैसे प्रलयकाल के वायु से युक्त मेघ इन्द्रधनुषरूपी लता को घुमाता है वैसे ही इसने आज यहाँ प…
  4. Verse 5सामने बैठा हुआ मैं उस चंचल मोरछल को देखकर अकेले इस घोड़े की पीठ पर अपने आप सवार हो गया |…
  5. Verse 6तदनन्तर जैसे प्रलयकाल में उत्पातवश हिल रहे पर्वत पर सवार होकर पुष्करावर्तनामक मेघराज चलता…
  6. Verses 7–14उस विशाल अरण्य का कहीं ओर-छोर न था । मेरा घोड़ा थक गया था । दूसरे आकाश के समान ओर आठवें अ…
  7. Verses 15–18जैसे विवेकी पुरुष संसार का अतिक्रमण करता हे, वैसे ही दुःखी हुए मैंने मध्य-रहित ओर विस्तीर…
  8. Verse 19पूर्व नीरस अरण्य से यह कुछ सुखकर था । अत्यन्त दुःखों से परिपूर्ण मरण से प्राणियों को व्या…
  9. Verses 20–23जैसे एकमात्र समुद्र में विहार करने के बाद मार्कण्डेयजी श्री विष्णु भगवान्‌ से अधिष्ठित श्…
  10. Verses 24–26सम्पूर्ण संसार के व्यवहारो के साथ सूर्य भगवान मानों विश्राम करने के लिए अस्ताचल रूपी आँगन…
  11. Verses 27–29विषधर सर्प से जिसका विवेक ईसा गया है अतएव गल रही स्मृतिवाले मृत्यु के वशीभूत पुरूष की नाई…
  12. Verse 30उस भीषण रात्रि में नींद का तो मुझसे स्पर्श भी नहीं हुआ, धैर्य भी मेरा न मालुम कहाँ चला गय…
  13. Verses 31–34तदनन्तर जैसे मैं अपने मुँह, नेत्र और तारिका के साथ मलिनता को प्राप्त किया गया था वैसे ही…
  14. Verses 35–41एक क्षण के बाद जैसे अज्ञानी को ज्ञान प्राप्त होता हो और जैसे दरिद्र को सुवर्ण मिले वैसे ह…
  15. Verse 42वहाँ पर केवल “चीं चीं चूं चं "यों चहचहा रहे पक्षी निशंक होकर निष्फल वनप्रदेश में परिभ्रमण…
  16. Verse 43हे बाले, जैसे पुराने पेड़ में खोखले में रहनेवाली व्याई (=) हुई काली साँपिन वृद्धि को प्रा…
  17. Verse 44जैसे लक्ष्मी प्रयत्नपूर्वक की गई प्रार्थना से पापी को धन नहीं देती है वैसे ही मेरी इस प्र…
  18. Verses 45–46तथापि मैं अन्न प्राप्ति की आशा से चिरकाल तक उसका अनुगामी बना रहा मेरे छाया के समान एक प्र…
  19. Verses 47–52हे राजन्‌, जैसे ग्रामीण जन से, जिसकी इच्छा पूरी न हुई हो, सुन्दर सौजन्य कोई पा नहीं सकता…
  20. Verse 53मेरे प्रतिज्ञा करने के उपरान्त जैसे प्राचीन काल में मोहिनीरूप धारण किये हुए भगवान्‌ ने आध…
  21. Verse 54मोह से मेरा चित्त हरा जा चुका था, अतएव मैंने वह भीलों के ग्राम का भात खाया और जामुन का रस…
  22. Verses 55–56जैसे मेघो से काली वर्षाऋतु सूर्य को छिपा देती हे वेसे ही वह श्यामल कामिनी मुझे वहाँ पर छि…
  23. Verses 57–61वह मुझ पर अनुरक्त थी, अतः जैसे अन्य भ्रमर पर अनुरक्त भंवरी हाथी के कान में मधुर ध्वनि से…
  24. Verses 62–69सूखने के लिए फैलाए हुए गीले आँतरूपी रस्सी के जाल पर मांसाहारी पक्षी टूट रहे थे, घर के बगी…
  25. Verses 70–71तदुपरान्त किसी दिन, जब कि मेघहीन आकाश में नक्षत्र दमक रहे थे, जैसे पाप नारकीय पीड़ा देता…
  26. Verse 72इस विवाहोत्सव में जिन्हें मदिरा और आसव का मद चढ़ा था, खूब जोर से नगाड़े बजा रहे थे, ऐसे च…