Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
आलोक्यैतामहं लोलामस्याश्वस्य पुरः स्थितः ।
पृष्ठमारूढवानेक आत्मना भ्रान्तमानसः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
सामने बैठा हुआ मैं उस चंचल मोरछल को देखकर अकेले
इस घोड़े की पीठ पर अपने आप सवार हो गया | उस समय मेरा मन कुछ भ्रान्त-सा हो गया
था