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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

अनेन भ्रमिताद्येह पिच्छिका तेजसोर्जिता । कल्पान्तपवनाभ्रेण शक्रचापलता यथा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे प्रलयकाल के वायु से युक्त मेघ इन्द्रधनुषरूपी लता को घुमाता है वैसे ही इसने आज यहाँ पर तेज से व्यूह यह मोर-पंखे का मोरछल घुमाया