Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 24–26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verses 24–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 24-26
संस्कृत श्लोक
यावत्समस्तसंसारव्यवहारभरैः समम् ।
रविर्विश्रमणायेव निविष्टोऽस्ताचलाङ्गणे ॥ २४ ॥
शनैः श्यामिकया ग्रस्ते समस्ते भुवनोदरे ।
रात्रिसंव्यवहारेषु संप्रवृत्तेषु जङ्गले ॥ २५ ॥
अहं तरुतृणे तस्मिन्पेलवे खण्डकोटरे ।
निलीनश्चिरलीनास्यः स्वनीडे विहगो यथा ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण संसार के
व्यवहारो के साथ सूर्य भगवान मानों विश्राम करने के लिए अस्ताचल रूपी आँगन में प्रविष्ट हो
गये । रात्रि द्वारा धीरे-धीरे सारे भुवन के मध्यभाग के ग्रसे जाने पर और जंगल में रात्रि के
व्यवहारो का राज होने पर जैसे पक्षी अपनी चोंच को डैनों के बीच में छिपाकर घोंसले में छिप
जाता है, वैसे मैं एक वृक्ष के पत्ते ओर तिनको से युक्त कोमल खण्डित खोखले में छिप
गया