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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 57–61

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verses 57–61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 57-61

संस्कृत श्लोक

तया मदनुषङ्गिण्या स्वार्थस्तस्मै निवेदितः । मातङ्गाय भ्रमर्येव निःस्वनेनालिलग्नया ॥ ५७ ॥ अयं मम भवेद्भर्ता तात हे तव रोचताम् । स तस्या बाढमित्युक्त्वा दिनान्ते समुपस्थिते ॥ ५८ ॥ मुमोच दान्तावाबद्धौ कृतान्तः किङ्कराविव । नीहाराभ्रकडारासु दिक्षु प्रोद्धूलितासु च । वेतालबन्धनात्तस्माद्दिनान्ते चलिता वयम् ॥ ५९ ॥ क्षणेन पक्कणं प्राप्ताः संध्यायां दीर्घजङ्गलात् । श्मशानादिव वेतालाः श्मशानमितरन्महत् ॥ ६० ॥ विकर्तितविभागस्थकपिकुक्कुटवायसम् । रक्तसिक्तोर्वराभागप्रभ्रमन्मक्षिकागणम् ॥ ६१ ॥

हिन्दी अर्थ

वह मुझ पर अनुरक्त थी, अतः जैसे अन्य भ्रमर पर अनुरक्त भंवरी हाथी के कान में मधुर ध्वनि से अपनी अभिलाषा कहती हे वैसे ही उसने अपनी अभिलाषा उस चण्डाल के (अपने पिता से) कान में मधुर ध्वनि से कही : पिताजी, यह मेरा पति हो, इसकी आप अनुमति दीजिये । उसने उससे अच्छा कहकर दिन बीतने पर जैसे काल अपने दो किंकरो को बाँधता है वैसे ही उसने बैलों को बाँध दिया । कुहरे ओर मेघ से कपिल दिशाओं के धूलि-धूसर होने पर वेतालो के निवासस्थान भूत उस वन से हम तीनों चले। जैसे वेताल श्मशान से दूसरे बड़े श्मशान में पहुँचते हँ वेसे ही सन्ध्या के समय हम लोग उस विशाल वन से एक क्षण में भीलों की बस्ती में पहुँचे | वहाँ पर कटे हुए बन्दर, मर्गे ओर कौए टुकड़े-टुकड़े करके रक्खे थे, खून से सींची हुई भूमि में मक्खियाँ भनभना रही थी