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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 1, 2

संस्कृत श्लोक

राजोवाच । अस्ति तावदयं देशो नानावननदीयुतः । वसुधामण्डलस्यास्य सहोदर इवानुजः ॥ १ ॥ अस्मिंश्चायमहं राजा पौराभिमतवृत्तिमान् । इन्द्रः स्वर्ग इवास्यां तु सभायां मध्यसंस्थित ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा ने कहा : हे सभासदों, इस पृथिवीमण्डलका सगा भाई सा यह देश, जो विविध वन और नदियों से युक्त है, आप सब लोगों के सन्मुख विद्यमान है। इस प्रदेश में यह मैं राजा, जो कि नगरवासियो का प्रिय हूँ, जैसे इन्द्र स्वर्ग में सभा के बीच में रहता है वैसे ही इस सभा के बीच में बैठा था

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ पाँचवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छठा सर्ग उक्त घोड़े द्वारा वन में पहुँचाये गये राजा का चाण्डाल कन्या के साथ विवाह वर्णन |