Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 70–71
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verses 70–71 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 70,71
संस्कृत श्लोक
निरभ्राम्बरनक्षत्रे कस्मिंश्चिद्दिवसे ततः ।
तैस्तैरारम्भसंरम्भैस्तैर्वस्त्रविभवार्पणैः ॥ ७० ॥
दत्ताप्यनेन सा मह्यं कुमारी भयदायिनी ।
सुकृष्णा कृष्णवर्णेन दुष्कृतेनेव यातना ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त किसी दिन, जब कि मेघहीन आकाश में नक्षत्र दमक रहे थे, जैसे
पाप नारकीय पीड़ा देता है वैसे ही काले वर्णवाले उस चण्डाल ने वह काली कलूटी भयानक
कुमारी कन्या चण्डालोचित मद्य, मांस आदि के संचय के साज-सरअंजाम, वस्त्र ओर धन के
समर्पण के साथ मुझे दी