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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 7–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verses 7–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 7-14

संस्कृत श्लोक

गन्तुं प्रवृत्तो मृगयामेकोऽहमतिरंहसा । उर्वरामिव निर्भर्तुः कल्लोलः प्रलयाम्बुधेः ॥ ७ ॥ तेनानिलविलोलेन दूरं नीतोऽस्मि वाजिना । योगाभ्यासजडेनाज्ञो मुग्धस्य मनसा यथा ॥ ८ ॥ अकिंचनमनःशून्यं स्त्रीचित्तमिव निर्भरम् । ततः प्रलयनिर्दग्धजगदास्पदभीषणम् ॥ ९ ॥ निष्पक्षिक्षारनीहारं निर्वृक्षमजलं महत् । संप्राप्तोऽहमपर्यन्तमरण्यं श्रान्तवाहनः ॥ १० ॥ तद्द्वितीयमिवाकाशं तथाष्टममिवाम्बुधिम् । पञ्चमं सागरमिव संशुष्कं शून्यकोटरम् ॥ ११ ॥ ज्ञस्येव विततं चेतो मूर्खस्येव रुषाऽजवम् । अदृष्टजनसंसर्गमजाततृणपल्लवम् ॥ १२ ॥ अरण्यमिदमासाद्य मतिर्मे खेदमागता । ललनेवैत्य दारिद्र्यं निरन्नफलबान्धवम् ॥ १३ ॥ कचन्मरुमरीच्यम्बुपुरःप्लुतककुम्मुखम् । आसूर्यास्तं दिनं तत्र प्रक्रान्तं सीदता मया ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

उस विशाल अरण्य का कहीं ओर-छोर न था । मेरा घोड़ा थक गया था । दूसरे आकाश के समान ओर आठवें अर्णव के (स्वादुदक समुद्र के बाद आठवें समुद्र यानी पूर्वं वर्णित भूमि के परिखारूप गर्त के) समान सूखे हुए पाँचवें सागर के समान (जम्बूद्वीप में चारों दिशाओं में चार सागरो की प्रसिद्धि है मानों वह पाँचवा सागर था) वह शन्यगर्तवाला था, तत्त्ववेत्ता के ब्रह्माकार चित्त के समान अपरिच्छिन्न था, मूर्ख के क्रोध के समान दुर्गम था, उसमें कभी कोई प्राणी पहुँचा न था और न कभी तृण पल्लव ही उगे थे | ऐसे भयंकर जंगल को पाकर मुझे बड़ा दुख हुआ । जैसे अन्न-फल- बन्धु - बान्धवो से रहित दरिद्रता को प्राप्त होकर दुःख पा रही ललना स्थित होती है, वैसे ही फैल रहे मरुमृगतृष्णा के जल से जहाँ पर दिशाओं के मुख आप्लावित हो रहे थे, ऐसे स्थान में स्थित अति दुःखी हो रहे मैंने सूर्यास्त होने तक सारा दिन वहाँ पर बिताया