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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 31–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verses 31–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 31-33

संस्कृत श्लोक

ततस्तिमिरलेखासु सह तारेन्दुकैरवैः । मयीवापाद्यमानासु म्लानतामलमानने ॥ ३१ ॥ शाम्यन्तीषु च वेतालक्ष्वेडासु जवजङ्गले । सहशीतार्तिमद्दन्तपङ्क्तिटाङ्कारसीत्कतैः ॥ ३२ ॥ मामेवार्तिविनिर्मग्नं हसन्तीमिव दृष्टवान् । अहं पूर्वां दिशं प्राप्तमधुपानारुणामिव ॥ ३३ ॥ क्षणादज्ञ इव ज्ञानं दरिद्र इव काञ्चनम् । दृष्टवानहमर्कं खे वारणारोहणोन्मुखम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर जैसे मैं अपने मुँह, नेत्र और तारिका के साथ मलिनता को प्राप्त किया गया था वैसे ही अन्धकार घटा के सितारों, चन्द्रमा ओर कुँई के फूलों के साथ खूब मलिनता को प्राप्त किये जाने पर और दीर्घ जंगल में वेतालों के सिंहनाद के शान्त होने पर दुःसह शीत की व्यथा से युक्त प्राणियों के दाँतों की पंक्तियों की खटखटाहट ओर चीत्कारों से क्लेश में पड़े हुए मेरा ही उपहास कर रही पूर्व दिशा को मैंने देखा जिसने मद्यपान से अरुणता प्राप्त की थी