Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 45–46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 45,46
संस्कृत श्लोक
केवलं चिरकालेन मयात्यन्तानुगामिना ।
खण्डात्खण्डं निपतति च्छायाभूते पुरःस्थिते ॥ ४५ ॥
तयोक्तं हारकेयूरिंश्चण्डालीं विद्धि मामिति ।
राक्षसीमिव सुक्रूरा पुरुषाश्वगजाशनाम् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
तथापि मैं अन्न प्राप्ति की आशा से चिरकाल तक
उसका अनुगामी बना रहा मेरे छाया के समान एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में उसके पीछे-पीछे
चलने पर उस रमणी ने मुझसे कहा : हे हारकेयुरधारिन् भद्र पुरुष, आप मुझे पुरुष, अश्व और
गज का भक्षण करनेवाली राक्षसी के तुल्य अत्यन्त क्रूर चाण्डालिन जानिये