Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 27–29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verses 27–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 27-29
संस्कृत श्लोक
विषदष्टविवेकस्य कीनाशस्य गलत्स्मृतेः ।
विक्रीतस्येव दीनस्य मग्नस्येवान्धकूपके ॥ २७ ॥
तत्र कल्पसमा रात्रिर्मोहमग्नस्य मे गता ।
एकार्णवोह्यमानस्य मार्कण्डेयमुनेरिव ॥ २८ ॥
न स्नातवान्नार्चितवान्न तदा भुक्तवानहम् ।
केवलं मे गता रात्रिः सापदां धुरि तिष्ठतः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
विषधर सर्प से जिसका विवेक ईसा गया है अतएव गल रही स्मृतिवाले मृत्यु
के वशीभूत पुरूष की नाई, बेचे गये दीन-हीन के सदुश ओर अन्धेरे कुएँ में डूबे हुए व्यक्ति के
तुल्य मोह में डूबे हुए मेरी कल्प के समान वह रात्रि ऐसे बीती जैसे एकमात्र प्रलयकालीन सागर
में बह रहे श्री मार्कण्डेय मुनि जी की प्रलयरात्रि बीती थी । उस काल में न मैने स्नान किया, न
देवताओं की पूजा की और न भोजन ही किया । आपत्तियुक्त लोगों की प्रथम श्रेणी में स्थित
हो रहे मेरी किसी प्रकार केवल वह रात्रि बीती