Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 35–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verses 35–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 35-37
संस्कृत श्लोक
उत्थायास्तरणं वस्त्रं तत्तदास्फोटितं मया ।
हस्तिचर्मद्वरेणेव संध्यानृत्यानुरागिणा ॥ ३५ ॥
प्रवृत्तस्तामहं स्फारां विहर्तुं जङ्गलस्थलीम् ।
कालो जगत्कुटीं कल्पदग्धभूतगणामिव ॥ ३६ ॥
न किंचिदृश्यते तत्र भूतं जरठजङ्गले ।
\\xa0अभिजातो गुणलवो यथा मूर्खशरीरके ॥ ३७ ॥
केवलं विगताशङ्कं खण्डभ्रमणचञ्चलम् ।
\\xa0चीचीकूचीतिवचना विहरन्ति विहङ्गमाः ॥ ३८ ॥
अथाष्टभागमापन्ने व्योम्नो दिवसनायके ।
शुष्कावश्यायलेशासु स्नातास्विव लतासु च ॥ ३९ ॥
दृष्टा मया प्रभ्रमता दारिकौदनधारिणी ।
गृहीतामृतसत्कुम्भा दानवेनेव माधवी ॥ ४० ॥
तरत्तारकनेत्रां तां श्यामामधवलाम्बराम् ।
अहमभ्यागतस्तत्र शर्वरीमिव चन्द्रमाः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
एक क्षण के बाद जैसे अज्ञानी को ज्ञान प्राप्त होता हो और जैसे दरिद्र को
सुवर्ण मिले वैसे ही मैंने पूर्व दिशा के ऐरावत नामक दिग्गज पर सवार होने के लिए (उससे
ऊपर उगने के लिए) तत्पर सूर्य को आकाश में देखा ॥ ३ ४॥ उस समय उठ कर मैंने जैसे
सन्ध्या के समय नृत्य में अनुराग रखने वाले शंकर भगवान् गज चर्म को झाड़ते हैं - इधर उधर
फटकारते हैं वैसे अपना बिछौना झाड़ा । जैसे काल जगत्रूपी कुटिया में, जिसमें प्रलयकालमें
भूतसंघ जल गये, विहार करता है वैसे ही मैं उस अतिविस्तीर्ण वनस्थली में विहार करने के
लिए उद्यत हुआ | जैसे मूर्ख के शरीर में कोई मनोहर गुण नहीं दिखाई देता वैसे ही उस जीर्ण
जंगल में मुझे एक भी प्राणी नहीं दिखाई दिया