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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 47–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verses 47–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 47-52

संस्कृत श्लोक

राजन्यार्चनमात्रेण मत्तो नाप्नोषि भोजनम् । ग्राम्यादनभिजातेहात्सौजन्यमिव सुन्दरम् ॥ ४७ ॥ इत्युक्तवत्या गच्छन्त्या खेलया च पदेपदे । कुञ्जकेषु निमज्जन्त्या लीलावनतयोदितम् ॥ ४८ ॥ ददामि भोजनमिदं भर्ता भवसि चेन्मम । लोको नोपकरोत्यर्थैः सामान्यः स्निग्धतां विना ॥ ४९ ॥ वाहयत्यत्र मे दान्तान्केदारे पुल्कसः पिता । श्मशान इव वेतालः क्षुधितो धूलिधूसरः ॥ ५० ॥ तस्येदमन्नं भवति भर्तृत्वे दीयते स्थिते । प्राणैरपि हि संपूज्या वल्लभाः पुरुषा यतः ॥ ५१ ॥ अथोक्ता सा मया भर्ता भवामि तव सुव्रते । केनापदि विचार्यन्ते वर्णधर्मकुलक्रमाः ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे राजन्‌, जैसे ग्रामीण जन से, जिसकी इच्छा पूरी न हुई हो, सुन्दर सौजन्य कोई पा नहीं सकता वैसे ही केवल याचनामात्र से आप मुझसे भोजन नहीं पा सकते हैं । यह कह चुकने के अनन्तर पद-पद पर हाव-भाव के साथ चल रही, वृक्षों कें निकुंजों में छिप रही तथा अपनी अभिलाषा के सूचक कटाक्ष आदि चेष्टाओं से विनम्र हुई उसने मुझसे यह कहा : यदि तुम मेरे पति बनते हो, तो मैं यह भोजन तुम्हें देती हू; क्योकि पामर लोग प्रेम के बिना किसी वस्तु से उपकार नहीं कर सकते | जैसे श्मशान भूमि में वेताल भूखा ओर धूलि से धूसर रहता हे वैसे ही यहाँ खेत में भूखा ओर धूलि से सना हुआ मेरा पिता, जो चाण्डाल है, बैलों को चला रहा है यानी खेत जोत रहा है । उसके लिए यह अन्न है, आपमें मेरा भर्तृत्व यदि स्थिर हो जाय, तो इस अन्न को आपको दे सकती हूँ, क्योकि प्रिय पुरुषों की प्राणों से पूजा करनी चाहिये । तदुपरान्त मेने उससे कहा : हे सुव्रते, मेँ तुम्हारा पति होता हूँ, आपत्ति में वर्ण, धर्म ओर कुलाचारों का कौन विचार करता हे २।