Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, Verses 62–69
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 106, verses 62–69 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 106 · श्लोक 62-69
संस्कृत श्लोक
शोषार्थं प्रसृतार्द्रान्त्रतन्त्रीजालपतत्खगम् ।
निष्कुटस्थितजम्बीरखण्डलग्नखगध्वनि ॥ ६२ ॥
शुष्यद्गुरुवसापिण्डपूर्णालिन्दलसत्खगम् ।
दृष्टिप्रसृतरक्ताक्तचर्मस्रवदसृग्लवम् ॥ ६३ ॥
बालहस्तस्थितक्रव्यपिण्डक्वणितमक्षिकम् ।
जर्जराधिष्ठचण्डालतर्जितारटितार्भकम् ॥ ६४ ॥
तत्प्रविष्टा वयं कीर्णशिरान्त्र भीमपक्कणम् ।
मृतभूतं जगत्कल्पे कृतान्तानुचरा इव ॥ ६५ ॥
संभ्रमोपहितानल्पकदलीदलपीठके ।
अहमास्थितवांस्तत्र नवे श्वशुरमन्दिरे ॥ ६६ ॥
श्वश्र्वा मे केकराक्ष्या तु तेनासृग्लवचक्षुषा ।
जामातायमिति प्रोक्तं तया तदभिनन्दितम् ॥ ६७ ॥
अथ विश्रम्य चण्डालभोजनान्यजिनासने ।
संचितान्युपभुक्तानि दुष्कृतानीव भूरिशः ॥ ६८ ॥
अनन्तदुःखबीजानि न मनोज्ञतराण्यपि ।
तानि प्रणयवाक्यानि श्रुतान्यसुभगान्यलम् ॥ ६९ ॥
हिन्दी अर्थ
सूखने के लिए फैलाए हुए गीले आँतरूपी रस्सी के जाल पर मांसाहारी पक्षी
टूट रहे थे, घर के बगीचों में खड़े जंभीर के पेड़ों पर बैठे पक्षीगण कलरव कर रहे थे, सूख रहे
बड़े भारी वसा (चर्बी) के पिण्डों से पूर्ण बाहर के दरवाजे की कोठरी में पक्षियों की चहल-पहल
हो रही थी, नेत्रो के गोलक से निकले हुए रुधिर से लथपथ चमड़ों से रुधिरबिन्दु टपक रहे थे,
बालकों के हाथ में स्थित मांसपिण्ड में मक्खियों के दल भनभना रहे थे, बूढ़े और बलिष्ठ
चाण्डालों द्वारा शोरगुल मचानेवाले बालक डाँटे-डपटे जा रहे थे | जैसे प्रलयकाल में मृत
प्राणियों से पूर्ण जगत् में यम के अनुचर प्रवेश करते हैं वैसे ही हम तीनों उस भयंकर भीलों की
बस्ती में गये । उसमें चारों ओर नसें और आँतें बिखरी थी । मैं उस नये श्वसुर के घर में बैठा,
जहाँ बड़े आदर के साथ बहुत से केले के पत्तेरूपी आसन बिछाये गये थे । खून के समान लाल
आँखवाले श्वसुर ने यह जमाई है, ऐसा मेरी सास से कहा, टेढ़ा देखनेवाली मेरी सास ने उसके
कथन का अभिनन्दन किया | तदनन्तर कुछ विश्राम कर, चर्म के आसन पर बैठकर इकट्ठा
किया हुआ विविध प्रकार का चण्डालोचित भोजन मैंने इस प्रकार खाया जैसे पापी पुरूष
अनेक प्रकार के संचित पापों का भोग करता हे मैंने बहुत से प्रेमालाप खूब सुने, जो अनन्त
दुःखों के बीज थे, कुछ मनोहर भी न थे एवं जिनमें किसी प्रकार का आकर्षण भी न
था