Guru's AddaGuru's Adda

Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 3

दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्ग दृश्य के मार्जन के उपाय, वासनाभेद -निरूपण पूर्वक उनके लक्षण तथा श्रीरामचन्द्रजी की तीर्थ यात्रा का विस्तार से वर्णन ।

28 verse-groups

  1. Verse 1जैसे जीवन्मुक्त श्रीरामचन्द्र आदि ने व्यवहार किया था वैसे ही तुम भी व्यवहार करो, ऐसा पूर्…
  2. Verse 2(00) टीकाकारो ने इस श्लोक के और प्रकार से भी अर्थ किये हैँ जैसे हे ब्रह्मन्‌, श्रीरामचन्द…
  3. Verse 3पूर्व श्लोक में मुक्ति के लक्षण और स्वरूप स्वानुभवसिद्ध दिखलाये, उनका अनुभव हमें क्यो नही…
  4. Verse 4उसकी प्राप्ति का क्या उपाय है ? इस पर कहते हैं। वत्स, इस योगवासिष्ठरूप शास्त्र के ज्ञात ह…
  5. Verse 5उक्त अर्थ को ही अधिक विशद करते हुए कहते हैं। हे अनघ, यह जगत्‌ वस्तुतः मिथ्या है, यह आकाश…
  6. Verse 6-अनुभूयते“ इससे उक्त अनुभव क्या आत्मचैतन्य ही है या अन्य है ? अन्य तो हो नहीं सकता, क्योक…
  7. Verse 7चैतन्यस्वरूप आत्मा के स़रिवा जो कुछ दिखाई देता है, वह सव जड़ अतएव आत्मा मे कल्पित ओर मिथ्…
  8. Verse 8उपासना आदि अन्य उपायों से प्राप्त होनेवाले सालोक्य आदि और भी मोक्ष हैं, उनसे निवृत्ति क्य…
  9. Verse 9वासनाओं के नष्ट होने पर वासनाओं के कारण रूप मन के अस्तित्व से फिर वासनाएँ पैदा हो (4) “मच…
  10. Verse 10मन के नष्ट होने पर भी स्थूल देहरूप बन्ध बना ही रहेगा ? जैसे पिरोये हुए सूक्ष्म सूत्र से (…
  11. Verse 11इस प्रकार उपोद्घात से उत्कृष्ट मुक्ति का वर्णन कर प्रस्तुत जीवन्मुक्ति को कहने की इच्छा स…
  12. Verse 12मलिन वासना का लक्षण कहते हैं। वासना बीजों के अंकुरित होने में अज्ञान ही सुक्षत्र हे । अज्…
  13. Verse 13शुद्ध वासना का लक्षण कहते है । जो भूने हुए बीज के समान अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति से शून…
  14. Verse 14जैसे बीज के अन्दर पहले से ही विद्यमान और सूक्ष्म अकुर समय, जल, मिटटी आदि के सम्बन्ध से आव…
  15. Verse 15जो लोग शुद्ध वासना से युक्त हे, वे ही ज्ञातज्ञेय (जिन्होंने ज्ञातव्य पदार्थ को, ब्रह्म को…
  16. Verses 16–17हे महामति भरद्वाज, महाबुद्धि श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकार जीवन्मुक्ति पद को प्राप्त हुए, उस…
  17. Verse 18वत्स भरद्वाज ! राजीवलोचन श्रीरामचन्द्रजी ने गुरुकुल से लौटकर कुछ दिन भाँति-भाँति की लीलाओ…
  18. Verse 19तदनन्तर कुछ समय बीतने पर जब कि महाराज दशरथ पृथिवी का पालन करते थे, शोकरहित प्रजा बड़े आनन…
  19. Verse 20यह सूचित करने के लिए (विगतज्वरम्‌” पद दिया है। उस समय महागुणशाली श्रीरामचन्द्रजी का मन ती…
  20. Verse 21श्रीरामचन्द्रजी ने पुण्य तीर्थो के दर्शन का यों विचार कर श्रीपितृचरणों के (श्रीमहाराज दशर…
  21. Verse 22श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : पिताजी ! तीर्थ, देवमन्दिर, वन और आश्रमों के दर्शन के लिए मेरा मन…
  22. Verse 23महाराज, मेरी इस प्रथम प्रार्थना को सफल (पूर्ण) करने की कृपा कीजिये इस संसार में कोई ऐसा न…
  23. Verse 24प्रार्थना थी, तीर्थदर्शन के लिए बड़े असमंजस में पड़कर अनुज्ञा दे ही दी
  24. Verses 25–27शुभ नक्षत्र ओर शुभ दिन में ब्राह्मणों द्वारा मंगलपाठ कराकर एवं मंगलमय वेश-भूषा से शरीर को…
  25. Verse 28नगरललनाओं से भँवरों की पंक्ति के समान चंचल नेत्रं द्वारा बड़े आदर के साथ देखे जा रहे श्री…
  26. Verses 29–30जैसे बर्फ की झड़ियों से हिमालय आच्छादित हो जाता है वैसे ही ग्रामीण महिलाओं के चंचल हाथों…
  27. Verses 31–41श्रीरामचन्द्रजी ब्राह्मणों को दान, सम्मान आदि से अपने वश में करते, प्रजाओं के आशीर्वाद सु…
  28. Verse 42जैसे सम्पूर्ण दिशाओं में विहार कर श्रीशिवजी शिवलोक में (केलास में) जाते हैं, वैसे ही तत्‌…