Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 3
दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्ग दृश्य के मार्जन के उपाय, वासनाभेद -निरूपण पूर्वक उनके लक्षण तथा श्रीरामचन्द्रजी की तीर्थ यात्रा का विस्तार से वर्णन ।
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- Verse 1जैसे जीवन्मुक्त श्रीरामचन्द्र आदि ने व्यवहार किया था वैसे ही तुम भी व्यवहार करो, ऐसा पूर्…
- Verse 2(00) टीकाकारो ने इस श्लोक के और प्रकार से भी अर्थ किये हैँ जैसे हे ब्रह्मन्, श्रीरामचन्द…
- Verse 3पूर्व श्लोक में मुक्ति के लक्षण और स्वरूप स्वानुभवसिद्ध दिखलाये, उनका अनुभव हमें क्यो नही…
- Verse 4उसकी प्राप्ति का क्या उपाय है ? इस पर कहते हैं। वत्स, इस योगवासिष्ठरूप शास्त्र के ज्ञात ह…
- Verse 5उक्त अर्थ को ही अधिक विशद करते हुए कहते हैं। हे अनघ, यह जगत् वस्तुतः मिथ्या है, यह आकाश…
- Verse 6-अनुभूयते“ इससे उक्त अनुभव क्या आत्मचैतन्य ही है या अन्य है ? अन्य तो हो नहीं सकता, क्योक…
- Verse 7चैतन्यस्वरूप आत्मा के स़रिवा जो कुछ दिखाई देता है, वह सव जड़ अतएव आत्मा मे कल्पित ओर मिथ्…
- Verse 8उपासना आदि अन्य उपायों से प्राप्त होनेवाले सालोक्य आदि और भी मोक्ष हैं, उनसे निवृत्ति क्य…
- Verse 9वासनाओं के नष्ट होने पर वासनाओं के कारण रूप मन के अस्तित्व से फिर वासनाएँ पैदा हो (4) “मच…
- Verse 10मन के नष्ट होने पर भी स्थूल देहरूप बन्ध बना ही रहेगा ? जैसे पिरोये हुए सूक्ष्म सूत्र से (…
- Verse 11इस प्रकार उपोद्घात से उत्कृष्ट मुक्ति का वर्णन कर प्रस्तुत जीवन्मुक्ति को कहने की इच्छा स…
- Verse 12मलिन वासना का लक्षण कहते हैं। वासना बीजों के अंकुरित होने में अज्ञान ही सुक्षत्र हे । अज्…
- Verse 13शुद्ध वासना का लक्षण कहते है । जो भूने हुए बीज के समान अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति से शून…
- Verse 14जैसे बीज के अन्दर पहले से ही विद्यमान और सूक्ष्म अकुर समय, जल, मिटटी आदि के सम्बन्ध से आव…
- Verse 15जो लोग शुद्ध वासना से युक्त हे, वे ही ज्ञातज्ञेय (जिन्होंने ज्ञातव्य पदार्थ को, ब्रह्म को…
- Verses 16–17हे महामति भरद्वाज, महाबुद्धि श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकार जीवन्मुक्ति पद को प्राप्त हुए, उस…
- Verse 18वत्स भरद्वाज ! राजीवलोचन श्रीरामचन्द्रजी ने गुरुकुल से लौटकर कुछ दिन भाँति-भाँति की लीलाओ…
- Verse 19तदनन्तर कुछ समय बीतने पर जब कि महाराज दशरथ पृथिवी का पालन करते थे, शोकरहित प्रजा बड़े आनन…
- Verse 20यह सूचित करने के लिए (विगतज्वरम्” पद दिया है। उस समय महागुणशाली श्रीरामचन्द्रजी का मन ती…
- Verse 21श्रीरामचन्द्रजी ने पुण्य तीर्थो के दर्शन का यों विचार कर श्रीपितृचरणों के (श्रीमहाराज दशर…
- Verse 22श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : पिताजी ! तीर्थ, देवमन्दिर, वन और आश्रमों के दर्शन के लिए मेरा मन…
- Verse 23महाराज, मेरी इस प्रथम प्रार्थना को सफल (पूर्ण) करने की कृपा कीजिये इस संसार में कोई ऐसा न…
- Verse 24प्रार्थना थी, तीर्थदर्शन के लिए बड़े असमंजस में पड़कर अनुज्ञा दे ही दी
- Verses 25–27शुभ नक्षत्र ओर शुभ दिन में ब्राह्मणों द्वारा मंगलपाठ कराकर एवं मंगलमय वेश-भूषा से शरीर को…
- Verse 28नगरललनाओं से भँवरों की पंक्ति के समान चंचल नेत्रं द्वारा बड़े आदर के साथ देखे जा रहे श्री…
- Verses 29–30जैसे बर्फ की झड़ियों से हिमालय आच्छादित हो जाता है वैसे ही ग्रामीण महिलाओं के चंचल हाथों…
- Verses 31–41श्रीरामचन्द्रजी ब्राह्मणों को दान, सम्मान आदि से अपने वश में करते, प्रजाओं के आशीर्वाद सु…
- Verse 42जैसे सम्पूर्ण दिशाओं में विहार कर श्रीशिवजी शिवलोक में (केलास में) जाते हैं, वैसे ही तत्…