Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
जगद्भ्रमोऽयं दृश्योऽपि नास्त्येवेत्यनुभूयते ।
वर्णो व्योम्न इवाखेदाद्विचारेणामुनाऽनघ ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ को ही अधिक विशद करते हुए कहते हैं।
हे अनघ, यह जगत् वस्तुतः मिथ्या है, यह आकाश में नीले, पीले आदि रंगों की भोति आपाततः
सत्य-सा प्रतीत होता है, किन्तु इस ग्रन्थ में दर्शित विचार से सहज में ही यह असत् (मिथ्या) है, यह
प्रतीत हो जाता है