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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

ये शुद्धवासना भूयो न जन्मानर्थभाजनम् । ज्ञातज्ञेयास्त उच्यन्ते जीवन्मुक्ता महाधियः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

जो लोग शुद्ध वासना से युक्त हे, वे ही ज्ञातज्ञेय (जिन्होंने ज्ञातव्य पदार्थ को, ब्रह्म को जान लिया है) होते हैं, ज्ञातज्ञेय होकर वे फिर जन्मरूप अनर्थ के भाजन नहीं होते अर्थात्‌ दुःखभाजन पुनर्जन्मपर विजय पाकर जीवन्मुक्त पद प्राप्त करते हैं वे ही वास्तव में बुद्धिमान्‌ कहे जाते हैं। (जीवन्मुक्त का यह लक्षण फलित हुआ कि जिस वासना की तत्त्वज्ञान से पुनर्जन्मांकुर की उत्पादि शक्ति जल गई है ऐसी वासनामात्र से जिनका शरीरधारण किया गया है, वे जीवन्मुक्त पुरुष है ।) (3)