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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

स चेह संभवत्येव तदर्थमिदमाततम् । शास्त्रमाकर्णयसि चेत्तत्त्वमाप्स्यसि नान्यथा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी प्राप्ति का क्या उपाय है ? इस पर कहते हैं। वत्स, इस योगवासिष्ठरूप शास्त्र के ज्ञात होने पर उक्त ज्ञान असम्भव नहीं है, बल्कि संभव ही अनादि जीव को ब्रह्म अभेद बोध कराने के लिए श्रुति में ब्रह्म में कार्योपाधिप्रवेश द्वारा आगन्तुक जीवभाव की कल्पना की गई है वैसे ही यहाँ पर भी समझना चाहिये, इसलिए कोई विरोध नहीं है। (५) यद्यपि परोक्षज्ञानी को भी सुषुप्ति मेँ ओर निर्विकल्प समाधि में दृश्य का विस्मरण होता है तथापि वह विस्मरण पुनःस्मरण नहीं है अर्थात्‌ उसे सुषुप्ति ओर समाधि के अनन्तर फिर ब्रह्म में जगत्‌ का भ्रम होता है । अथवा पुनःस्मरण का अर्थ “पुनः स्मर्यतेऽनेन - फिर जिससे स्मरण किया जाय इस व्युत्पत्ति से अन्तःकरण है । उक्त अन्तःकरण जिसमें नहीं है एेसा विस्मरण-स्मरण का अभाव । यह द्वैत के प्रतिभासमात्र के अभाव का उपलक्षण है । अथवा विस्मरण के समान विस्मरण यह अर्थ है । जैसे विस्मृत विषय की अनुभवकर्ता के रहने पर भी प्रतीति नहीं होती वैसे ही चैतन्य के रहते हुए ही दृश्य की अप्रतीति विस्मरण है । शंका : क्या परमार्थ सत्य दृश्य की ही जैसे सांख्यं की अभिमत मुक्ति में अप्रतीति होती है वैसे ही आपके अभिमत मुक्ति मेँ भी अप्रतीति होती है समाधान : नहीं, हमारे मत में जगत्‌ परमार्थ सत्य नहीं है, वह ब्रह्म मेँ अध्यस्त है । शंका : वह भ्रम कैसे है, क्योंकि वह संस्कार से जन्य नहीं है । समाधान : वह पूर्व पूर्व जगत्‌ के व्यवहार से उत्पन्न संस्कार से जन्य है । शंका : दोष से उत्पन्न न होने ओर अधिष्ठानशून्य होने से वह भ्रम नहीं है । समाधान : जैसे दूरत्व ओर अविचाररूप दोष से आकाश में नीले रंग का भ्रम होता है वैसे ही अविद्यारूप दोष से ब्रह्म मे जगत्‌ का भ्रम होता है । दृश्य का आत्यन्तिक उच्छेद मुक्ति का लक्षण है ओर आत्यन्तिक दृश्यविनाश से उपलक्षित चिन्मात्र में अवस्थान मुक्ति का स्वरूप है, यह निष्कर्ष निकला | है। इस उद्देश्य से ही इस ग्रन्थ का निर्माण आरम्भ किया है । यदि तुम जब तक तत्त्व का निर्णय न हो, तब तक भक्ति और श्रद्धा के साथ इसका श्रवण करो, तो अवश्य ही तुम्हें तत्त्वज्ञान प्राप्त होगा, अन्यथा कदापि भ्रम का संशोधन नहीं होगा । भ्रमसंशोधन हुए बिना तत्त्वज्ञान हो ही नहीं सकता