Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verses 31–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, verses 31–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 31-41
संस्कृत श्लोक
अथारभ्य स्वकात्तस्मात्क्रमात्कोशलमण्डलात् ।
स्नानदानतपोध्यानपूर्वकं स ददर्श ह ॥ ३१ ॥
नदीतीराणि पुण्यानि वनान्यायतनानि च ।
जङ्गलानि जनान्तेषु तटान्यब्धिमहीभृताम् ॥ ३२ ॥
मन्दाकिनीमिन्दुनिभां कालिन्दीं चोत्पलामलाम् ।
सरस्वतीं शतद्रूं च चन्द्रभागामिरावतीम् ॥ ३३ ॥
वेणीं च कृष्णवेणीं च निर्विन्ध्यां सरयूं तथा ।
चर्मण्वतीं वितस्तां च विपाशां बाहुदामपि ॥ ३४ ॥
प्रयागं नैमिषं चैव धर्मारण्यं गयां तथा ।
वाराणसीं श्रीगिरिं च केदारं पुष्करं तथा ॥ ३५ ॥
मानसं च क्रमसरस्तथैवोत्तरमानसम् ।
वडवावदनं चैव तीर्थवृन्दं स सादरम् ॥ ३६ ॥
अग्नितीर्थं महातीर्थमिन्द्रद्युम्नसरस्तथा ।
सरांसि सरितश्चैव तथा नदह्रदावलीम् ॥ ३७ ॥
स्वामिनं कार्तिकेयं च शालग्रामं हरिं तथा ।
स्थानानि च चतुःषष्टिं हरेरथ हरस्य च ॥ ३८ ॥
नानाश्चर्यविचित्राणि चतुरब्धितटानि च ।
विन्ध्यमन्दरकुञ्जांश्च कुलशैलस्थलानि च ॥ ३९ ॥
राजर्षीणां च महतां ब्रह्मर्षीणां तथैव च ।
देवानां ब्राह्मणानां चे पावनानाश्रमाञ्छुभान् ॥ ४० ॥
भूयोभूयः स बभ्राम भ्रातृभ्यां सह मानदः ।
चतुर्ष्वपि दिगन्तेषु सर्वानेव महीतटान् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ब्राह्मणों को दान, सम्मान आदि से अपने वश में करते, प्रजाओं
के आशीर्वाद सुनते और दिशाओं के अन्त भागों को देखते हुए गहन वनों में खूब घूमे ॥ ३ ०॥ तदुपरान्त
अति श्रेष्ठ अपनी राजधानी कोशल से आरम्भ कर श्रीरामचन्द्रजी ने स्नान, दान, तप, ध्यान करते हुए
पवित्रतम नदीतट, पुण्य वन, आश्रम, जंगल, देशों की सीमाओं में स्थित समुद्र और पर्वतों के तट,
चाँदनी के समान स्वच्छ श्रीभागीरथी, नील कमल के तुल्य निर्मल श्रीयमुना, सरस्वती, सतलज, चिनाब,
इरावती, केवल वेणी नदी, कृष्णा से मिली हुई वेणी, निर्विन्ध्या, सरयू, चर्मण्वती, वितस्ता, व्यास,
बाहुदा, प्रयाग, नैमिषारण्य, धर्मारण्य, गया, काशी, श्रीशैल, केदारनाथ, पुष्कर, क्रमप्राप्त मानस
सरोवर, उत्तर मानस, हयग्रीवतीर्थ, अग्नितीर्थं (ज्वालामुखी), महातीर्थ इन्द्रद्युम्नसर आदि पुण्य तीर्थ,
सर, पुण्यतम नदियाँ, नद, तालाब आदि के सादर दर्शन किये । स्वामी का्तिकिय, शालग्रामरूपी हरि,
श्रीहरि के तथा महादेवजी के चौसठ स्थान, आश्चर्यमय विविध विचित्रताओं से पूर्ण चारों समुद्रो के तट,
विन्ध्याचल ओर मन्दराचल के लतागृह (झाड़ियाँ), हिमालय आदि सात कुल पर्वत, बड़े बड़े महर्षियों,
राजर्षियों, देवताओं और ब्राह्मणों के पवित्रतम ओर मंगलमय आश्रमो के बड़े आदर से दर्शन किये ।
दूसरों का सम्मान करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ने अपने भाइयों के साथ चारों दिशाओं के प्रान्तभागों
(सीमाओं) एवं सम्पूर्ण पृथ्वी मेँ पुनः पुनः (पहले दर्शन करने पर भी लौटते समय निकट में आये हुए
स्थानों मेँ कौतूहल से या उनकी अधिक महिमा प्रकट करने के लिए फिर फिर) भ्रमण किया