Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
दृश्यं नास्तीति बोधेन मनसो दृश्यमार्जनम् ।
संपन्नं चेत्तदुत्पन्ना परा निर्वाणनिर्वृतिः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
-अनुभूयते“ इससे उक्त अनुभव क्या आत्मचैतन्य ही है या अन्य है ? अन्य तो हो नहीं सकता,
क्योकि चित् से अन्य, जड़ ओर विषय होने से, अनुभव के योग्य नहीं है । यदि आत्मा ही अनुभव है, तो
वह पहले ही विद्यमान है, फिर शास्त्र की क्या आवश्यकता ? ऐसी शका पर कहते है ।
यद्यपि आत्मा ही अनुभव है तथापि वह दृश्य के साथ सम्मिलित है, अत: उसका अनुभव नहीं
होता, किन्तु मन की वृत्तिरूप आत्मततत्वसाक्षात्काररूप बोध द्वारा अविद्या का नाश होने से अविद्याजन्य
दृश्य तीनों कालों में भी नहीं है, अर्थात् वह मायावी की माया के समान तीनों कालों मे मिथ्या है । जो
उसका द्रष्टा है वही सत्य है । यह सत् आत्मा ही सर्वत्र विराजमान और प्रकाशमान है