Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
भ्रमस्य जागतस्यास्य जातस्याकाशवर्णवत् ।
अपुनःस्मरणं मन्ये साधो विस्मरणं वरम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
(00) टीकाकारो ने इस श्लोक के और प्रकार से भी अर्थ किये हैँ जैसे हे ब्रह्मन्, श्रीरामचन्द्रजी
क्रम से जीवन्मुक्त हुए थे, ऐसी कल्पना कर मुझसे पहले से किये, जिस क्रम से मैं नित्य सुखी होऊ ।
अथवा संवाद-कथा मेँ श्रीरामचन्द्रजी को पहले से प्रश्नकर्ता और श्रीवसिष्ठजी को वक्ता बनाकर जैसे
श्रुति जनक और याज्ञवल्क्य की कल्पना करके स्वयं ही संवादरूप से तत्त्व का बोध कराती है वैसे ही
आप भी मुञ्चे तत्त्वज्ञान कराइए । इस प्रकार तत्त्वज्ञरूप से कल्पित दशरथ आदि की पूर्वरामायण में
मूढचर्या ओर मुक्ति का अभाव देखने एवं नित्यमुक्त श्रीरामचन्द्रजी के "तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या
ईशते“ इत्यादि श्रुति से विरुद्ध शापमूलक अज्ञत्व आदि के वर्णन से भी कोई क्षति नहीं है, क्योकि जैसे
भरद्वाज के यों पूछने पर महर्षिं वाल्मीकिजी जीवन्मुक्ति का लक्षण, स्वरूप, साधन ओर फल
द्वारा जीवन्मुक्तस्थिति का विस्तार करने की इच्छा से सुखमूर्वक ज्ञान होने के लिए पहले संक्षेप से
मुक्ति का लक्षण ओर स्वरूप दिखलाते हैं।
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : वत्स भरद्वाज, जैसे भ्रमवश रुपरहित आकाश में नीले, पीले आदि रंगों
का भान होता है वैसे ही अज्ञानवश ब्रह्म में जगत् का भ्रम होता हे । इसलिए प्रमाण ओर अनुभव से मैंने
निश्चय किया है कि नीरूप आकाश में नीले, पीले आदि रंगों की भाँति ब्रह्म मेँ कल्पित अत्यन्त
असम्भावित जगत् का समूल अविद्या ओर उसके संस्कार के नाश द्वारा जैसे फिर स्मरण ही न हो उस
प्रकार विस्मरण होना ही सबसे उत्कृष्ट मुक्ति का लक्षण और स्वरूप है (४६)