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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

अन्यथा शास्त्रगर्तेषु लुठतां भवतामिह । भवत्यकृत्रिमाज्ञानां कल्पैरपि न निर्वृतिः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

चैतन्यस्वरूप आत्मा के स़रिवा जो कुछ दिखाई देता है, वह सव जड़ अतएव आत्मा मे कल्पित ओर मिथ्या है, इस प्रकार दृश्य वस्तु का मार्जन अथात्‌ अस्तित्वपरिहार हो जाय, तो नित्यसिद्ध आत्मरूप भी परमनि्वृत्ति (निर्वाण नामक मोक्ष) उस ज्ञान से उत्पन्न -सी होती है । उक्त वृत्ति से हआ केवल स्वरूपभूत अनुभव शास्त्र का फल है, यह भाव है । अन्य शात्त्रों में दर्शित उपायों से ही मुक्ति क्‍यों न हो ? अन्यथा पूर्वोक्त उपाय का ग्रहण न करने पर अनादि अज्ञान से अन्धे अनात्मा का प्रतिपादन करनेवाले शास्त्ररूपी गढ़ढों में ठोकर खा रहे-रागान्ध जनों के पतन के कारणभूत गर्ततुल्य तत्‌ तत्‌ शास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट उपायों से एेहिक ओर पारलौकिक विषयों मे आसक्त होकर आचरण कर रहे अतएव विषयों के उपभोग के लिए बार वार जन्म ग्रहण कर रहे मूर्खो को अनन्त ब्रह्मकल्पों से भी निर्वृत्ति (निर्वाण मोक्ष) नहीं मिल सकती । भाव यह हे कि अनादि अज्ञान की ज्ञान से अतिरिक्त हजारों साधनों से भी निवृत्ति नहीं हो सकती