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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

अपुनर्जन्मकरणी जीवन्मुक्तेषु देहिषु । वासना विद्यते शुद्धा देहे चक्र इव भ्रमः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बीज के अन्दर पहले से ही विद्यमान और सूक्ष्म अकुर समय, जल, मिटटी आदि के सम्बन्ध से आविर्भूत हो जाते हैं वैसे ही वासनाओं के अन्दर पहले से ही विद्यमान आगामी जन्मपरम्परा काम, कर्म आदि निमित्त से आविर्भूत होती है, क्योकि अत्यन्त असत्‌ का जन्म ही नहीं हो सकता । ऐसी अवस्था में तत्वज्ञान द्वारा अविद्यारूपी क्षेत्र के जल जाने से उसके अन्तर्गत जन्माकुर का नाश होने पर भी अपने प्रारब्ध से प्रतिबद्ध भूने हुए बीजों के समान केवल देहधारणमात्र ही जिसका प्रयोजन है ऐसी जो वासना अवशिष्ट रहती है, वह शुद्ध वासना है, यह भाव हे । उक्त अर्थ को ही स्फुट करते हैं। पुनर्जन्म का निवारण करनेवाली शुद्ध वासना जीवन्मुक्त पुरुषों के शरीर में, चक्र में भ्रमण के समान, मृत संस्काररूप से रहती है अर्थात्‌ देहधारणरूप कार्य से उनमें भी वासना के अस्तित्व का अनुमान होता है