Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
पुनर्जन्माङ्कुरं त्यक्त्वा स्थिता संभृष्टबीजवत् ।
देहार्थं ध्रियते ज्ञातज्ञेया शुद्धेति चोच्यते ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
शुद्ध वासना का लक्षण कहते है ।
जो भूने हुए बीज के समान अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति से शून्य होकर रहती हे अर्थात् पुनर्जन्म
की उत्पादक कारण न होकर केवल मात्र प्रारब्धवश देह आदि का अवलम्बन करके रहती है अर्थात्
देहधारणमात्र से पर्यवसित होती है, वह शुद्ध वासना कही जाती है