Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 3, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
क्षीणायां वासनायां तु चेतो गलति सत्वरम् ।
क्षीणायां शीतसंतत्यां ब्रह्मन्हिमकणो यथा ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
वासनाओं के नष्ट होने पर वासनाओं के कारण रूप मन के अस्तित्व से फिर वासनाएँ पैदा हो
(4) “मच्” धातु बन्धन की निवृत्तिरूप अर्थ में रूढ़ है । वासनाएँ ही मुख्य बन्धन है । सालोक्य
आदि मुक्तियों में वासनाओं का नाश नहीं होता, इसलिए उनमें मोक्षशब्द गौण है ।
जायेगी, उनसे बन्धन भी होगा 2
हे ब्रह्मन्, जैसे शीत के नष्ट होने पर हिमकण तुरन्त गल जाते हैं, वैसे ही वासनाओं के नष्ट होने
पर वासनापुंजरूप चित्त शीघ्र नष्ट हो जाता हे