Guru's AddaGuru's Adda

Vairagya Prakarana (Dispassion) · Sarga 18

सत्रहवाँ सर्ग समाप्त अठारहवाँ सर्ग आधि, व्याधि आदि अनेक क्लेशों तथा जरा-मृत्यु से ग्रस्त अभिमान ओर तृष्णा के मूलकारण शरीर की निन्दा ।

35 verse-groups

  1. Verse 1तृष्णा भले ही दुःख की कारण हो, पर 'जीवन्नरो भद्रशतानि पश्येत्‌“ (जीवित पुरुष अनेक मंगलो क…
  2. Verse 2युक्तिमार्ग का अवलम्बन करने पर स्पष्टरूप से ज्ञात होता है किं यह जीव शरीर दो रूपवाला हे ।…
  3. Verse 3चंचल एवं अशुद्ध चित्तवाला है
  4. Verse 4यह शरीर अल्प खाने-पीने से आनन्द को प्राप्त होता है ओर अल्प शीत-उष्ण आदि के क्लेशको प्राप्…
  5. Verses 5–8यह शरीर उपेक्षणीय है, यह दशनि के लिए वृक्ष के रूपक से उसका वर्णन करते हैं । यह शरीर वृक्ष…
  6. Verse 9यह शरीर सब लोगों मेँ आत्मरूप से प्रसिद्ध है, इसको उपेक्षणीय कैसे कहते हैं 2 ऐसी शका होने…
  7. Verse 10रोमरूपी असंख्य वृक्ष और इन्द्रियरूपी अनेक गड्ढों से युक्त देहनामक निर्जन वन में कौन पुरुष…
  8. Verse 11पूज्य मुनिजी, साररहित तथा छिद्रयुक्त, मांस, नसें (स्नायु) और हड्डियों से वेष्टित ओर बाहर…
  9. Verses 12–17छः श्लोको से देह का पाकड़ के वृक्ष के रूपक से निरूपण करते हैं। शरीररूपी पाकड़ का वृक्ष मु…
  10. Verse 18महामुने, अहंकाररूपी गृहस्थ का महान्‌ गृह यह कलेवर चाहे भूमि में गिरकर बदल जाय, चाहे चिरका…
  11. Verses 19–20इस देहरूपी अहंकार के घर में इन्द्रियरूपी पशु कतार बाँधकर खड हैँ, तृष्णारूपी गृहस्वामिनी (…
  12. Verse 21स्नायु (नस) रूपी रस्सियाँ जिसमें चारों ओर तनी हैं, रस, रक्तरूप जल से रचित गारे से लिपा गय…
  13. Verses 22–23चित्तरूपी नौकर ने विविध चेष्टाओं द्वारा इसकी स्थिति इतनी मजबूत कर रक्खी है कि यह गिर नहीं…
  14. Verses 24–27हे मुने, यह देहरूपी गृह दोषपूर्ण विषयसमूहरूपी बर्तनों ओर अन्यान्य सामग्रियों से ठसाठस भरा…
  15. Verse 28जिसमें सम्पूर्ण अंगरूपी दीवारों में रोमरूपी निविड (खूब घने) जौके अंकुर उगे हैं और पेटरूपी…
  16. Verses 29–31जिसमें नखरूपी मकड़ियों के जाले तने हैं, कुन्ती की नाई भ्रमण, दीनता, कलह आदि करानेवाली क्ष…
  17. Verse 32त्वचारूपी चूने के लेप से (पलस्तर से) चिकना हे, सम्पूर्ण सन्धिर्य इस घर के यन्त्र हैं, उनक…
  18. Verses 33–35क्षणभर मेँ मन्दहासरूपी दीपों की प्रभा से उज्ज्वल एवं आह्लाद से देदीप्यमान और क्षणभर में अ…
  19. Verse 36हे मुनीश्वर, जैसे कोई निर्बल जीव कीचड़ में फँसे हुए हाथी को नहीं निकाल सकता, वैसे ही मैं…
  20. Verses 37–38क्या राजलक्ष्मी, क्या शरीर और क्या राज्य, क्या मनोरथ- इनमें से किसी से भी मेरा कुछ प्रयोज…
  21. Verses 39–47मुनिवर, रक्त और मांस से विरचित विनाशशील इस देह के बाहर और भीतर भली भाँति देखकर कहिए कि इस…
  22. Verse 48दुष्टतारूपी बड़े बड़े बंधनों से युक्त ओर दुश्चरितों से जिसका पतन अवश्यम्भावी है, ऐसी देहर…
  23. Verse 49यह शरीर कीचड़ से भरे हुए पल्वलों में (तलैयों मे) निमग्न मेंढक के समान विषय- भोग में अत्यन…
  24. Verse 50जैसे धूलिपटलयुक्त आकाशमार्ग से जा रही आँधी को कोई देख नहीं सकता, क्योकि धूलि के कारण नेत्…
  25. Verse 51वायु की, दीपक की और मन की गति-उत्पत्ति ओर विनाश-जैसे अज्ञात है वैसे ही इस शरीर की उत्पत्त…
  26. Verse 52जो लोग अनित्य शरीरों में नित्यत्व का आदर करते हैं और जो लोग संसार स्थिति के विषय में नित्…
  27. Verse 53न मैं देह का सम्बन्धी हूँ, न देह मैं हूँ, न मेरी देह है और न मैं ही देह हूँ, ऐसा विचारकर…
  28. Verses 54–55मान और अपमान से वृद्धि को प्राप्त हुई एवं प्रचुर लाभ से सुन्दर लगनेवाली दुष्ट दृष्टियाँ क…
  29. Verse 56शरीर को ही सब कुछ समझनेवाली इस मिथ्याज्ञानरूपिणी राक्षसीने अकेली अतएव दीन-हीन प्रज्ञा (सु…
  30. Verse 57जब इस दृश्य प्रपंच में कोई भी वस्तु सत्य नहीं है, तब उसके मध्यवर्ती होने से यह शरीर भी सत…
  31. Verse 58यदि जनता को ठगने से इस शरीर का कोई प्रयोजन सिद्ध होता, तो किसी अंश में वह नन्तव्य भी होता…
  32. Verse 59समुद्र में उत्पन्न हुए जल के बुद्बुदों की नाई इस शरीर का विनाश बहुत शीघ्र हो जाता है, यह…
  33. Verse 60अज्ञानजनित हे, स्वप्नरूपी भ्रान्तियों का आधार है और इसका विनाश सर्वथा स्पष्ट है, इसलिए इस…
  34. Verse 61जिस पुरुष ने बिजली में, शरत्‌ ऋतु के मेघो में और गन्धर्वनगर में ये चिरस्थायी हैं, ऐसा निर…
  35. Verse 62किसका शीघ्र विनाश होता है, इस विषय में अपना अपना उत्कर्ष जताने के लिए हठ से प्रवृत्त हुए…