Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
निःसारसकलारम्भाः कायाश्चपलवायवः ।
रजोमार्गेण गच्छन्तो दृश्यन्ते नेह केनचित् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे धूलिपटलयुक्त आकाशमार्ग
से जा रही आँधी को कोई देख नहीं सकता, क्योकि धूलि के कारण नेत्र बन्द हो जाते हैं, कुछ भी नहीं
दिखाई देता, इस देहसमुदायकी चेष्टाएँ भी ठीक आँधी के ही अनुरूप हैं अर्थात् इसकी सब चेष्टाएँ
नीरस (अनर्थकारिणी), और दर्शनशक्ति का नाश करनेवाली हैं। यह शरीर ही आँधीरूपी चपलता का
मूल है, यही राजसी प्रवृत्ति का उत्पादन कर आत्मदर्शन में बाधक होता है