Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 62
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, verse 62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
सततभङ्गुरकार्यपरम्परा विजयिजातजयं हठवृत्तिषु ।
प्रबलदोषमिदं तु कलेवरं तृणमिवाहमपोह्य सुखं स्थितः ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
किसका शीघ्र विनाश होता है, इस विषय में अपना अपना उत्कर्ष जताने के
लिए हठ से प्रवृत्त हुए सम्पूर्णं पदार्थो मेँ से सदा विनाशशील कार्यो में विजयी होनेवाले बिजली, शरत्
ऋतु के मेघ आदि से भी, नाशक सामग्री के अधिक होने से, उत्कृष्ट इस शरीर को तृण से भी तुच्छ
समझकर मैं परम सुखी हुआ हूँ