Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
मांसस्नाय्वस्थिवलिते शरीरपटहेऽदृढे ।
मार्जारवदहं तात तिष्ठाम्यत्र गतध्वनौ ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
पूज्य मुनिजी, साररहित तथा छिद्रयुक्त, मांस, नसें (स्नायु)
और हड्डियों से वेष्टित ओर बाहर निकलने (मुक्त होने) के उपायभूत उपदेश (शब्द) से विरहित इस
शरीररूपी नगाड़े में मैं बिल्ली की तरह रहता हूँ