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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verses 12–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, verses 12–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 12-17

संस्कृत श्लोक

संसारारण्यसंरूढो विलसच्चित्तमर्कटः । चिन्तामञ्जरिताकारो दीर्घदुःखघुणक्षतः ॥ १२ ॥ तृष्णाभुजङ्गमीगेहं कोप काक कृतालयः । स्मितपुण्योद्गमः श्रीमाञ्छुभाशुभमहाफलः ॥ १३ ॥ सुस्कन्धोघलताजालो हस्तस्तबकसुन्दरः । पवनस्पन्दिताशेषस्वाङ्गावयवपल्लवः ॥ १४ ॥ सर्वेन्द्रियखगाधारः सुजानुस्तम्भ उन्नतः । सरसच्छायया युक्तः कामपान्थनिषेवितः ॥ १५ ॥ मूर्धसंजनिताऽऽदीर्घशिरोरुहतृणावलिः । अहंकारगृध्रकृतकुलायः सुषिरोदरः ॥ १६ ॥ विच्छिन्नवासनाजालमूलत्वाद्दुर्लवाकृतिः । व्यायामविरसः कायप्लक्षोऽयं न सुखाय मे ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

छः श्लोको से देह का पाकड़ के वृक्ष के रूपक से निरूपण करते हैं। शरीररूपी पाकड़ का वृक्ष मुझे सुखकारक प्रतीत नहीं होता । यह संसाररूपी अरण्य में पैदा हुआ है, चित्तरूपी चपल बन्दर इसमें इधर उधर कूदता फाँदता है, चिन्तारूपी मंजरी से यह फूला हुआ है, महादुःखरूपी घुनों ने इसके चारों ओर छेद कर रक्खे हैं, तृष्णारूपी सर्पिणी का यह घर है, कोपरूपी कोए ने इसमें घोंसला बना रक्खा है, मन्द हासरूप प्रस्फुटित पुष्पों से यह शोभायमान है, शुभ और अशुभ (पुण्य और पाप) ये दो इसके महाफल हैं, भुजाएँ ही इसमें लताएँ हैं, हाथ ही पुष्पों के गुच्छे हैं, यह बड़ा भला लगता है, प्राणवायुरूप वायु से इसके सम्पूर्ण अवयवरूपी पत्ते हिल रहे हैं, सम्पूर्ण इन्द्रियरूपी चिड़ियाँ इसमें बसेरा करती हैं, सुन्दर घुटनों से युक्त अधोभाग इसका तना है, यह उन्नत है ओर यौवनकान्तिरूपी शीतल छाया से युक्त है । कामदेवरूपी यात्री इस पर बास करता है, सिर में उगे हुए खूब लम्बे सिर के केश उसके बरोह हैँ । अहंकाररूपी गीध इसमें घोसला बनाकर डटा है, यह भीतर से खोखला (छिद्रयुक्त) है । विविध वासनारूपी जटाओं से चारों ओर वेष्टित होने के कारण दुश्छेद्य है, व्यायामरूपी विस्तार से कोमलतारहित ओर रूक्ष भी हे