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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

तात संतरणार्थेन गृहीतायां पुनःपुनः । नावि देहलतायां च कस्य स्यादात्मभावना ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

यह शरीर सब लोगों मेँ आत्मरूप से प्रसिद्ध है, इसको उपेक्षणीय कैसे कहते हैं 2 ऐसी शका होने पर कहते हैं। पूज्यवर, संसार-सागर को पार करने के लिए पुनः पुनः गृहीत नौकारूपी देह में किसकी आत्मबुद्धि होगी ? अर्थात्‌ जैसे सागर को पार करने के लिए गृहीत नौका में किसी की आत्मसंभावना का संभव नहीं है, वैसे ही संसार को पार करने के लिए अर्थात्‌ संसार से मुक्त होने के लिए बार बार गृहीत देह में किसकी आत्मभावना हो सकती है ?