Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
वायोर्दीपस्य मनसो गच्छतो ज्ञायते गतिः ।
आगच्छतश्च भगवञ्छरीरस्य कदाचन ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
वायु की, दीपक की
और मन की गति-उत्पत्ति ओर विनाश-जैसे अज्ञात है वैसे ही इस शरीर की उत्पत्ति, विनाश आदि
अज्ञात हैं। यह क्या है, किस प्रकार से और कहाँ से आता है और कहाँ जाता है, इस बात को कोई नहीं
जानता