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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

मज्जन्कर्दमकोशेषु झटित्येव जरां गतः । न ज्ञायते यात्यचिरात्कः कथं देहदर्दुरः ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

यह शरीर कीचड़ से भरे हुए पल्वलों में (तलैयों मे) निमग्न मेंढक के समान विषय- भोग में अत्यन्त निमग्न होकर वृद्धावस्था से आक्रान्त हो जाता है, किन्तु यह शीघ्र ही कहाँ जायेगा और किस प्रकार की दुर्दशाओं से ग्रस्त होगा, यह ज्ञात नहीं होता