Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
बद्धास्था ये शरीरेषु बद्धास्था ये जगत्स्थितौ ।
तान्मोहमदिरोन्मत्तान्धिग्धिगस्तु पुनःपुनः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
जो लोग अनित्य शरीरों में नित्यत्व का आदर करते हैं और जो लोग संसार स्थिति के
विषय में नित्यत्व का अभिमान करते है अर्थात् जो लोग शरीरों को तथा संसार को आशायुक्त, चिरस्थायी
और सत्य मानते हैं वे मोह (अज्ञान) रूपी मदिरा से उन्मत्त हैं, उन्हें बार-बार धिक्कार है