Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verses 39–47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, verses 39–47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 39-47
संस्कृत श्लोक
मरणावसरे काया जीवं नानुसरन्ति ये ।
तेषु तात कृतघ्नेषु कैवास्था वद धीमताम् ॥ ३९ ॥
मत्तेभकर्णाग्रचलः कायो लम्बाम्बुभङ्गुरः ।
न संत्यजति मां यावत्तावदेनं त्यजाम्यहम् ॥ ४० ॥
पवनस्पन्दतरलः पेलवः कायपल्लवः ।
जर्जरस्तनुवृत्तश्च नेष्टो मे कटुनीरसः ॥ ४१ ॥
भुक्त्वा पीत्वा चिरं कालं बालपल्लवपेलवाम् ।
तनुतामेत्य यत्नेन विनाशमनुधावति ॥ ४२ ॥
तान्येव सुखदुःखानि भावाभावमयान्यसौ ।
भूयोऽप्यनुभवन्कायः प्राकृतो हि न लज्जते ॥ ४३ ॥
सुचिरं प्रभुतां कृत्वा संसेव्य विभवश्रियम् ।
नोच्छ्रायमेति न स्थैर्यं कायः किमिति पाल्यते ॥ ४४ ॥
जराकाले जरामेति मृत्युकाले तथा मृतिम् ।
सम एवाविशेषज्ञः कायो भोगिदरिद्रयोः ॥ ४५ ॥
संसाराम्भोधिजठरे तृष्णाकुहरकान्तरे ।
सुप्तस्तिष्ठति मुक्तेहो मूकोऽयं कायकच्छपः ॥ ४६ ॥
दहनैकार्थयोग्यानि कायकाष्ठानि भूरिशः ।
संसाराब्धाविहोह्यन्ते कंचित्तेषु नरं विदुः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिवर,
रक्त और मांस से विरचित विनाशशील इस देह के बाहर और भीतर भली भाँति देखकर कहिए कि
इसमें कौन-सी रमणीयता है ? ॥३ ८॥ पूज्यवर, भला आप ही कहिये जो शरीर मरने के समय जीव के
पीछे नहीं जाते जीव का त्याग कर देते हैं, उन कृतघ्न शरीरों पर ज्ञानवान् पुरुषों का क्या आदर हो
सकता है ? मदोन्मत्त हाथी के कानों के अग्रभाग की तरह चंचल और हाथी के कान के अग्रभाग में लटक
रहे जलबिन्दु के समान विनाशशील यह शरीर मुझे छोड़े, उससे पहले ही मैं इसका त्याग कर देता हूँ।
वायु के वेग से परिचालित कोमल पत्ते के समान चंचल यह शरीर आधि-व्याधिरूपी सैकड़ों काँटों से
क्षत-विक्षत होने के कारण जर्जर हो जाता है । इस क्षुद्र स्वभाव, कट् और नीरस देह से हमारा किंचित्मात्र
भी उपकार नहीं हे । चिरकाल तक भाँति-भाँति के सुन्दर खाद्य ओर पेय पदार्थों को खा-पीकर नवीन
पत्ते के समान कोमल कृशता को प्राप्त होकर स्वतः विनाश की ओर अग्रसर होता है। यह पामर शरीर
पूर्व जन्मों में बारबार उपयुक्त ही भाव और अभावरूप सुख-दुःखोँ का पुनः पुनः अनुभव करता हुआ
लज्जित नहीं होता । जब यह दीर्घकालतक लोगों पर अपना आधिपत्य जमाकर और विविध विभवों को
पाकर न तो वृद्धि या उत्कर्ष को प्राप्त होता है और न स्थिरता को प्राप्त होता है, तब इसके परिपालन
या परिक्षण से क्या लाभ ? यह शरीर बुढ़ापे के समय में बुढ़ापे को अवश्य प्राप्त होता है और मरने के
समय मृत्यु को अवश्य प्राप्त होता है, यह नियम भाग्यवान् और दरिद्र दोनों के लिए समान है, उसमें
किसी प्रकार का भेद नहीं है, किन्तु यह बात इस अधम देह को ज्ञात नहीं है। यह शरीर मूक कच्छप के
(कच्छपों द्वारा-दुष्ट इन्द्रियो द्वारा-दुर्विषयरूपी कीचड़ का पान करनेवाले कछुए के) समान संसाररूप
समुद्र के उदर में तृष्णारूपी छोटे बिल के अन्दर रहता है । अपनी आत्मा के उद्धार के अनुकूल इच्छा
ओर चेष्टा भी इसमें नहीं है और गुरु के समीप में जाकर आत्मा के विषय में प्रश्न आदिरूप वाणी भी
इसमें नहीं है । इस संसाररूपी महासागर में केवल जलना ही जिनका मुख्य प्रयोजन है, ऐसे हजारों
देहरूपी काष्ठ भासित होते है, पर धीमान् जन उनमें से किसी को ही “नर' कहते हैं, अर्थात् जो
ज्ञानाग्नि द्वारा जलाया जा सकता है, वह देह ही नरदेह है