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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

किं श्रिया किं च राज्येन किं कायेन किमीहितैः । दिनैः कतिपयैरेव कालः सर्वं निकृन्तति ॥ ३७ ॥ रक्तमांसमयस्यास्य सबाह्याभ्यन्तरं मुने । नाशैकधर्मिणो ब्रूहि कैव कायस्य रम्यता ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

क्या राजलक्ष्मी, क्या शरीर और क्या राज्य, क्या मनोरथ- इनमें से किसी से भी मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है, क्योकि थोड़े ही दिनों में काल उन सबका नाश कर डालता है अर्थात्‌ नाशवान वस्तु से किसका क्या लाभ हो सकता है ?