Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

चित्तभृत्यकृतानन्तचेष्टावष्टब्धसंस्थिति । मिथ्यामोहमहास्थूणं नेष्टं देहगृहं मम ॥ २२ ॥ दुःखार्भककृताक्रन्दं सुखशय्यामनोरमम् । दुरीहादग्धदासीकं नेष्टं देहगृहं मम ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्तरूपी नौकर ने विविध चेष्टाओं द्वारा इसकी स्थिति इतनी मजबूत कर रक्खी है कि यह गिर नहीं सकता, मिथ्या ओर अज्ञान इसके अधारस्तम्भ हैं, दुःखरूपी बाल-बच्चों ने इसमें रो रोकर कुहराम मचाया हे, सुख-शय्या (सुषुप्ति) से यह मनोहर है, दुश्चेष्टारूपी दाह-व्रण से पीडित दासी इसमें रहती है, ऐसा देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं हे