Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 99
अद्ठानबेवाँ सर्ग समाप्त निन्नानवेवों सर्ग कृमि, कीट, पतंग, तिर्यग्योनि, स्थावर आदि जातियों का इस संसार मे जैसे भोग होता है, उन सबका वर्णन ।
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- Verses 1–2कृषि, कीट आदि अतिगूढ़ जन्दुओं का तो जीवन ही दुर्लभ हो जायेगा, क्योकि तात्कालिक द्रःखथान्त…
- Verse 3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, इस संसार में जितने भी जीव हैं वे चाहे स्थावर हों, चाहे ज…
- Verse 4रहती हैं, परन्तु हम लोगों को उन भोगों में एक तो आस्था नहीं है और उनको प्राप्त करने में को…
- Verse 5यदि प्रश्न हो कि भोगो में बहुत आस्था है, यह आपने केसे जाना, तो इसका उत्तर है-प्रयत्न की अ…
- Verse 6एकमात्र शून्य विषयवाले गगनपक्षी निराधार आकाश में उत्पन्न होते हैं और वहींपर मर जाते हैं,…
- Verse 7कण आदि के उपार्जन में पिपीलिका आदि का अधिक प्रयत्न देखा जाता है, इससे भी अनुमान होता है क…
- Verse 8भद्र, यह एक और नवीनता सुनिये-तिमिनाम का जो अत्यन्त छोटा त्रसरेणु के बराबर का जीव है, उसकी…
- Verse 9देह में ओर देह भोग्य वस्तुओं में अहंताममता का अभ्यात्त मनुष्य और कृमि दोनों को एक सा हैं,…
- Verse 10विषयों की आस्था के कारण आयु का जो निरथ्थक क्षय हो जाता हैं, वह भी हम मनुष्य एवं कीट आदि क…
- Verse 11वृक्ष आदि स्थावर जीव कुछ जागते रहते हैं, पत्थर एकदम सोते ही रहते हैं। यानी घनी नींद से सो…
- Verse 12शरीरकाल मेँ सुखपूर्वक स्थित ये जो कृमि, कीट आदि हैं, उनको भी हम लोगों के सदृश शरीरविनाश ह…
- Verse 13हम लोगों के भोग्य, धट महल, धन आदि को वे कैसे देखते हैं; इसे कहते हैं / जैसे बेचा गया पुरु…
- Verse 14जैसे मनुष्य जाति के जीवों को संसार सुख-दुःख देनेवाला है, वैसे ही तिर्यग्योनि पशुओं को भी…
- Verse 15बेचे गये मनुष्य की समानता पशु में बतलाते हैं बैल आदि पशु, जो नाथे जाते हैं, मन से भीतर भी…
- Verse 16वृक्ष आदि के दुख, दुःख के अनुभव की प्रणाली हमारे चख दुःख के अनुभव के अनुरूप ही हैं, ऐसा उ…
- Verse 17पूर्व में जो यह कहा था कि हम लोगों की भोति ही पशु, गृगादि को भी संसार छुख और द्ुःखदायक है…
- Verse 18यदि मन विकल्प-ज्ञान से शून्य हो तो आह्वादस्वरूप आत्मानन्द में और भोजन, निद्रा, मैथुन आदि…
- Verse 19राग, द्वेष, भय, आहार और स्त्रीसंगजनित सुख और दुःख तथा जन्म-मरण के समय होनेवाला क्लेश इन्द…
- Verse 20शास्त्रवेद्य पुण्य, पाप, ब्रह्मतत्त्व आदि तथा अतीत और भावी पदार्थो के सिवा शेष ज्ञान नेवल…
- Verse 21तो पर्वत आदि कैसे अनुभव करते हैं 2 इस आशंकापर कहते हैं । गाढ निद्रावाले (सुषुप्ति में स्थ…
- Verse 22ङस प्रकार न तो वृक्ष आदि जीवों की द्रष्ट से जगत् की कल्पना हो सकती है, क्योकि वे याढ़ नि…
- Verse 23जो पर्वत आदि की सत्ता और जो वृक्षों की निद्रा है, वह द्वैतज्ञानविहीन होने के कारण अखण्ड च…
- Verse 24औरों की दृष्टि से भी आत्मतत्त्व जब तक परिज्ञात न हो तभी तक जगत् है आत्मतत्व का परिज्ञान…
- Verse 25शिला के समान ठोस, शान्त, अपने स्वरूप से अप्रच्युत, उत्पत्ति-नाश से रहित निर्दोष ब्रह्म ही…
- Verse 26पररमार्थद्रष्टि से तो सद् ही एकरूप है, यह कहते हैं / सृष्टि के पहले सृष्टि आदि जगत् जैस…
- Verse 27सत् विद् आनन्दरूप उसके आत्मत्व आदि भेद भी नहीं हैं; क्योकि कोई व्यावर्त्य नहीं है फिर ओ…
- Verse 28आप अपने स्वरूप में ही स्थित रहिये, मैं भी अपने स्वरूप में ही स्थित हूँ, परम आकाश में सुख…
- Verse 29जरा बतलाइये तो सही स्वप्न नगर में परमाकाशता को छोड़कर क्या है ? निर्मल, निर्विकार शान्त च…
- Verse 30केवल अज्ञान ही उसमें भ्रान्ति उत्पन्न करनेवाला है । जब परम ब्रह्म का परिज्ञान हो जाता है…
- Verse 31जब जगतरूपी स्वप्न का ज्ञान हो जाता है तब उसमें कुछ भी सत्यता नहीं रहती । जगत् के प्रति अ…
- Verse 32स्वप्नकाल के ज्ञात होने पर प्रत्येक अणु मेँ जगत्-स्वप्न की सम्भावना होती है, किन्तु प्रब…
- Verse 33जिस वस्तु की प्रबोधअवस्था में कुछ भी सत्ता नहीं है वह अबोधावस्था में भी कहींपर नहीं हे ।…
- Verse 34न तो वर्तमान सच है, न भविष्यत् सच है ओर न भूतकाल ही सच है, न अज्ञान सच है ओर न उनका ज्ञा…
- Verses 35–36ऐसी स्थिति में मिथ्या देह आदि के निथ्या शत्रुओं द्वारा नष्ट किये जाने पर भी उन दोनो के अध…
- Verses 37–38आकाशरूप चित् में ही देह ऐसा भ्रमात्मक ज्ञान ही पैदा होता है ऐसी अवस्था में भ्रमात्मक ज्ञ…
- Verse 39पूर्व चित् के स्वप्न से सृष्टि के आदि में पृथिवी आदि पदार्थबुद्धि का उदय हुआ स्वप्न के प…
- Verse 40वह भ्रान्ति वैसी बद्धमूल हुई कि निपट असत्य होती हुई भी परम सत्यता को प्राप्त हो गई । किन्…
- Verse 41असत्यस्वरूप जयत्भ्रान्ति को मूढो ने अपनी कयोलकल्यना से सच छी मान लिया हैं. यों इव से सत्…
- Verse 42तब अस्त्य पदार्थ में अत्यन्त अप्राभिद्ध सत्यता की समानता का ग्रतिबोधक क्या होगा 2 ऐसी आशं…
- Verse 43अज्ञान के कार्य के साथ अज्ञान का नाश होने पर चिन्मात्र शेष रहने से पृथ्वी आदि किसी का कही…
- Verse 44जैसे दर्पण में निमित्तभूत बाहरी बिम्ब से भीतर प्रतिबिम्ब की प्रतीति होती है वैसे ही निमित…
- Verse 45दर्पण के दरष्टान्त से विवक्षित अश को कहते हैं / जैसे दर्पण के अन्दर दिख रहा भी बिम्ब वास्…
- Verse 46जो वस्तु शास्त्रीय विचार से प्राप्त होती है जिसकी स्थिति प्रमाणरूप कसौटी से प्रमाणित है व…
- Verse 47यदि जगत् असत् है तो वह व्यवहारार्थं क्रिया के योग्य केसे हैं, इस शंकापर कहते हैं / कुछ…
- Verses 48–49अहम्“ आदि जगत् की शोभा ग्रतिभाम्रिक ही है, अन्य प्रकार की नहीं है जो जयत् का भान है वह…
- Verse 50तब मूर्ख को मरण और जन्म में करयो कर दुःख प्राप्त होता है 2 ऐसा यदि कड प्रश्न करे तो उसके…
- Verse 51तत्त्वज्ञ की दृष्टि से तो केवल चिदाकाश ही "तुम" भे" आदिरूप सम्पूर्ण जगत बनकर प्रकाशमान हो…