Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
देशकालक्रियाद्रव्यव्यग्रया जर्जरीकृतम् ।
क्षीयते व्रणकीटानामस्माकमिव जीवितम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
विषयों की आस्था के कारण आयु का जो निरथ्थक क्षय हो जाता हैं, वह भी हम मनुष्य एवं कीट
आदि का समान है, यह कहते हैं ।
देश, काल, क्रिया, द्रव्य आदि विषयों की प्राप्ति के निमित्त व्यग्र बुद्धि से जैसे हम लोगों का
जीवन जर्जर यानी क्षीण हो जाता है, वैसे ही व्रणकीटों का भी उक्त व्यग्र बुद्धि से जीवन क्षीण हो
जाता है