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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । सर्वाण्येवेह भूतानि स्थावराणि चराणि च । आत्मोचितायां सत्तायां विश्रान्तानि स्थितान्यलम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, इस संसार में जितने भी जीव हैं वे चाहे स्थावर हों, चाहे जंगम हों, वे सब अपने अपने योग्य भोगों के उचित सुखसत्ता में ही विश्राम किये रहते हैं और उसीसे अपना-अपना जीवन भी धारण किये हुए हैं, इससे निष्कर्ष यह निकला कि तत्‌-तत्‌ योनियों में भोग्य जो विषयसुख की मात्रा है, वही तत्‌-तत्‌ जीवों का महान पुरुषार्थ है, इसी सुखमात्र से वे विश्रान्ति लेते हैं और उसीकी आशा से अनेक दुःख झेलते हुए जीते रहते हैं